
तेरे बिना हर लम्हा एक फूल की तरह मुरझाता है, यादें तेरी अब मेरी तन्हाई का साया बन जाती हैं। चाँद की रौशनी में भी, तेरा अक्स नहीं दिखता, शायद अब मुझे भी तन्हाई से मोहब्बत हो गई है।

जब तन्हाई की चादर ओढ़ी, तेरे बिना हर सुबह अधूरी। आँखों में बस गई हैं यादें, फिर भी दिल है बेकरार, न जाने क्यों।

वो कौन सा सहरा था, जहाँ तूने मुझे छोड़ा, हर कदम पर तेरा ही एहसास मेरे साथ है। खामोशियों में तेरी यादें बसी हैं यूँ, जैसे चाँद की रौशनी, रात के वीराने में।

तेरे बिना ये दुनिया जैसे सुनसान, सपने बटोरकर भी मिले नहीं कोई अरमान। हर रूह में बस तेरा ही नाम है, बिछड़ने की इस खामोशी में, क्या फिर भी कोई एहसान है?
Comments
Loading comments...