
तूने कहा था, 'दिल से खेलना है', पर अब तेरा दिल ही नहीं, बस खेल रह गया। कभी हंसते-हंसते जुदा नहीं हुए, फिर ये आंसू क्यों तेरे ही घर रह गए।

तुम्हारे हंसने से बजी थी एक ख़ामोश जिन्दगी, जब तुम पास थी, फोन की घंटियाँ थीं बेकरार। अब हर रिंग में तुम ही हो, पर नहीं हो तुम कहीं, सुनो, ये ख़ामोशी भी है एक अजीब सा दोधारी प्यार।

चाय की खुशबू में खो गया हूँ, तेरे ख्वाबों की चाशनी में डूबा हूँ। बातों की मिठास से भरे ये लम्हे, कभी तो मिल, दिल से दिल को जोड़ दूँ।

तेरे बिना अधूरी है ये शाम, जैसे चाय में बिना चीनी का एक पैगाम। हर जज़्बात में तेरा ही नाम, कभी तेरा साथ, कभी तेरा आराम।
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